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अद्वयतारक • अध्याय 1 • श्लोक 20
गुरुरेव परा काष्ठा गुरुरेव परं धनं । यस्मात्तदुपदेष्टाऽसौ तस्माद्गुरुतरो गुरुरिति ॥
गुरु ही पराकाष्ठा है, गुरु ही परम (श्रेष्ठ) धन है। जो श्रेष्ठ उपदेश करता है, वही गुरु से गुरुतर अर्थात् श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम गुरु है, ऐसा जानना चाहिए।
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