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अद्वयतारक • अध्याय 1 • श्लोक 15
अन्तर्लक्ष्यविकल्पाः अन्तर्लक्ष्यज्वलज्ज्योतिःस्वरूपं भवति । परमगुरूपदेशेन सहस्रारज्वलज्ज्योतिर्वा बुद्धिगुहानिहितचिज्ज्योतिर्वा षोडशान्तस्थतुरीयचैतन्यं वा अन्तर्लक्ष्यं भवति । तद्दर्शनं सदाचार्यमूलं ॥
अन्तर्लक्ष्य उज्वल शुभ्र ज्योति के रूप में हो जाता है। परम सद्गुरु का ज्ञान प्राप्त हो जाने पर सहस्र दल कमल में स्थित उज्वल-ज्योति अथवा बुद्धि-गुहा में स्थित रहने वाली ज्योति अथवा फिर वह सोलह कला के अन्त: में विद्यमान तुरीय चैतन्य स्वरूप अन्तर्लक्ष्य होता है। यही दर्शन सदाचार का मूल है।
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