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अद्वयतारक • अध्याय 1 • श्लोक 10
द्विविधं तारकम् तत्तारकं द्विविधं पूर्वार्धं तारकमुत्तरार्धममनस्कं चेति । तदेष श्लोको भवेति -तद्योगं च द्विधा विद्धि पूर्वोत्तरविधानतः। पूर्वं तु तारकं विद्यात् अमनस्कं तदुत्तरमिति ॥
इस तारक योग की दो विधियाँ बतलाई गई हैं। जिसमें प्रथम पूर्वार्द्ध है और द्वितीय उत्तरार्द्ध। इस सन्दर्भ में यह शेक द्रष्टव्य है - यह योग पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध दो प्रकार का होता है। पूर्व को ‘तारक’ एवं उत्तर को ‘अमनस्क’ (मनः शून्य होना) कहा गया है।
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