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आत्मबोध • अध्याय 2 • श्लोक 9
शुद्धोऽहमद्वयोऽहं सन्ततभावोऽहमादिशून्योऽहम् । शमितान्तत्रितयोऽहं बद्धो मुक्तोऽहमद्भुतात्माहम् ॥
मैं शुद्ध हूँ, अद्वैत हूँ, सतत भाव रूप हूँ। आदि रहित हूँ। मैं (जीव, प्रकृति एवं ब्रह्म के) त्रित से रहित हूँ। मैं बद्ध, मुक्त और अ‌द्भुत स्वरूप वाला आत्मतत्त्व हूँ।
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