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आत्मबोध • अध्याय 2 • श्लोक 7
निरवधिनिजबोधोऽहं शुभतरभावोऽहमप्रभेद्योऽहम् । विभुरहमनवद्योऽहं निरवधिनिःसीमतत्त्वमात्रोऽहम् ॥
मैं अवधिरहित निज बोध रूप हूँ, मैं श्रेष्ठतर भावों से युक्त तथा भेदरहित हूँ। मैं अति विराट् तथा निर्दोष हूँ, अवधि एवं सीमा से रहित केवल आत्म स्वरूप हूँ।
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