मैं त्रिगुणातीत अक्षय परम पद हूँ। मेरे उदर (कुक्षि) में अनेकों लोक विद्यमान हैं। मैं कूटस्थ चैतन्य स्वरूप हूँ, क्रियारहित धाम (आश्रय स्थल) हूँ तथा मैं वितर्क्स रहित हूँ।
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