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आत्मबोध • अध्याय 2 • श्लोक 5
निस्त्रैगुण्यपदोऽहं कुक्षिस्थानेकलोककलनोऽहम् । कूटस्थचेतनोऽहं निष्क्रियधामाहमप्रतर्क्योऽहम् ॥
मैं त्रिगुणातीत अक्षय परम पद हूँ। मेरे उदर (कुक्षि) में अनेकों लोक विद्यमान हैं। मैं कूटस्थ चैतन्य स्वरूप हूँ, क्रियारहित धाम (आश्रय स्थल) हूँ तथा मैं वितर्क्स रहित हूँ।
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