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आत्मबोध • अध्याय 2 • श्लोक 4
अवबोधैकरसोऽहं मोक्षानन्दैकसिन्धुरेवाहम् । सूक्ष्मोऽहमक्षरोऽहं विगलितगुणजालकेवलात्माऽहम् ॥
मैं एकमात्र ज्ञानरूप, रस स्वरूप हूँ। मोक्ष के आनन्द का एकमात्र सागर हूँ। मैं सूक्ष्म हूँ। मैं अक्षर हूँ। में विनष्ट गुण समूह वाला (त्रिगुणातीत) हूँ। मैं तो केवल आत्मा ही हूँ।
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