आत्मप्रबोधोपनिषदं मुहूर्तमुपासित्वा न स पुनरावर्तते न
स पुनरावर्तत इत्युपनिषत् ॥
इस आत्मप्रबोध उपनिषद् का जो व्यक्ति कुछ क्षण भी उपासना (साक्षात्कार प्राप्त) कर लेता है, वह पुन: इस संसार में नहीं आता है, ऐसी यह उपनिषद् है।
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