चिद्रूपत्वान्न मे जाड्यं सत्यत्वान्नानृतं मम ।
आनन्दत्वान्न मे दुःखमज्ञानाद्भाति सत्यवत् ॥
मैं चैतन्य स्वरूप हैं, इसलिए मुझ में जड़ता नहीं है। मैं सत्य स्वरूप हैं, इस कारण मुझ में झूठ नहीं है। मैं आनन्द स्वरूप हूँ। आनन्द स्वरूप होने के कारण मुझ में दु:ख नहीं हैं। ये सभी (जगत्प्रपंच) तो केवल अज्ञान से ही प्रतिभासित होते हैं।
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