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आत्मबोध • अध्याय 2 • श्लोक 29
कालत्रये यथा सर्पो रज्जौ नास्ति तथा मयि । अहङ्कारादिदेहान्तं जगन्नास्त्यहमद्वयः ॥
जैसे रस्सी में तीनों कालों में कभी भी सर्प नहीं है, वैसे ही अहंकार से लेकर शरीर तक का संसार मेरे अन्दर तीनों काल में नहीं है, मैं तो केवल अद्वैत रूप में ही हूँ।
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