यथामृतं विषाद्भिन्नं विषदोषैर्न लिप्यते ।
न स्पृशामि जडाद्भिन्नो जडदोषान्प्रकाशतः ॥
जिस प्रकार से अमृत विष से अलग है, इस कारण विष के दोषों से वह दूषित नहीं होता, उसी प्रकार मैं (आत्मा) जड़ से भिन्न हूँ। अत: जड़ के दोषों का मुझमें स्पर्श नहीं होता।
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