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आत्मबोध • अध्याय 2 • श्लोक 26
चक्षुर्दृष्टिनिरोधेऽभ्रैः सूर्यो नास्तीति मन्यते । तथाऽज्ञानावृतो देही ब्रह्म नास्तीति मन्यते ॥
जैसे बादलों के कारण चारों ओर से दृष्टि के रुक जाने से लोग समझने लगते हैं कि सूर्य नहीं है, वैसे ही मूढ़ता से आवृत प्राणी यह मान लेता है कि ब्रह्म है ही नहीं।
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