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आत्मबोध • अध्याय 2 • श्लोक 21
आत्मानमञ्जसा वेद्मि क्वाप्यज्ञानं पलायितम् । कर्तृत्वमद्य मे नष्टं कर्तव्यं वापि न क्वचित् ॥
मैं आत्मा को तो अनायास-सहज ही जानता हूँ, मेरा अज्ञान न मालूम कहाँ पलायन कर गया है I अब मेरा कर्तृत्व-भाव बिल्कुल नष्ट हो गया है तथा मुझे कुछ भी करना शेष नहीं है।
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