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आत्मबोध • अध्याय 2 • श्लोक 20
प्राणाश्चलन्तु तद्धर्मैः कामैर्वा हन्यतां मनः । आनन्दबुद्धिपूर्णस्य मम दुःखं कथं भवेत् ॥
प्राण भले ही निकल जायें और मन चाहे अपने धर्मों एवं कामनाओं से विनाश को प्राप्त हो जाये; परन्तु आनन्द एवं बुद्धि की पूर्णता के कारण मुझे कैसे दुःख प्राप्त हो सकता है?
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