न मे बन्धो न मे मुक्तिर्न मे शास्त्रं न मे गुरुः ।
मायामात्रविकासत्वान्मायातीतोऽहमद्वयः ॥
न मेरे लिए कोई बन्धन है और न ही मुक्ति, न मेरे लिए कोई शास्त्र है और न ही मेरा कोई गुरु॥ ये सब तो माया के विकास मात्र हैं तथा मैं (आत्मा) माया से परे स्वयं अद्वैत रूप हूँ।
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