दारिद्र्याशा यथा नास्ति सम्पन्नस्य तथा मम ।
ब्रह्मानन्दे निमग्नस्य विषयाशा न तद्भवेत् ॥
जिस तरह सम्पत्ति से सम्पन्न व्यक्ति को दरिद्रता की कोई संभावना नहीं रहती, उसी तरह ही ब्रह्म के आनन्द में निमग्न रहने वाले मुझको विषयों की कोई आशा नहीं रहती।
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