तरङ्गस्थं द्रवं सिन्धुर्न वाञ्छति यथा तथा ।
विषयानन्दवाञ्छा मे मा भूदानन्दरूपतः ॥
जिस तरह समुद्र की तरंगों में रहने वाले जल की इच्छा नहीं करते, उसी तरह केवल आनन्द स्वरूप होने में मुझे विषयों के आनन्द की कोई भी इच्छा नहीं रहती।
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