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आत्मबोध • अध्याय 2 • श्लोक 14
ब्रह्मादिकीटपर्यन्ताः प्राणिनो मयि कल्पिताः । बुद्बुदादिविकारान्तस्तरङ्गः सागरे यथा ॥
जिस प्रकार सागर में बुलबुले से लेकर तरंगें तक कल्पित हैं, उसी प्रकार मेरे द्वारा ब्रह्म से लेकर कीट पर्यन्त प्राणिमात्र कल्पित हैं।
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