यथेक्षुरससंव्याप्ता शर्करा वर्तते तथा ।
अद्वयब्रह्मरूपेण व्याप्तोऽहं वै जगत्त्रयम् ॥
केवल मात्र ब्रह्म सत्ता के आधार पर ही प्रपञ्च का व्यवहार है, यह जगत् तो है ही नहीं। जिस तरह शक्कर गन्ने के रस में व्याप्त है, उसी तरह ही अद्वैत ब्रह्म आनन्द रूप में तीनों लोकों में विद्यमान है।
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