निवृत्तोऽपि प्रपञ्चो मे सत्यवद्भाति सर्वदा ।
सर्पादौ रज्जुसत्तेव ब्रह्मसत्तैव केवलम् ।
प्रपञ्चाधाररूपेण वर्ततेऽतो जगन्न हि ॥
मेरी दृष्टि से प्रपञ्च निवृत्त (दूर) हो गया है, तब भी सर्वदा वह सत्य के सदृश प्रतिभासित होता है। निश्चय ही सर्प आदि में जिस प्रकार रस्सी का अस्तित्व है, उसी प्रकार ही प्रपञ्च का भी अस्तित्व है।
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