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आत्मबोध • अध्याय 2 • श्लोक 1
प्रगलितनिजमायोऽहं निस्तुलदृशिरूपवस्तुमात्रोऽहम् । अस्तमिताहन्तोऽहं प्रगलितजगदीशजीवभेदोऽहम् ॥
मेरी स्वयं की माया विशेष रूप से गलित हो गई है। मैं अतुल दर्शन रूप वस्तु मात्र ही हूँ। मेरा अहंकार नष्ट हो चुका है तथा जगत्, ईश्वर एवं जीव जैसे भेद मेरे लिए नष्ट हो गये हैं।
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