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अध्यात्म • अध्याय 1 • श्लोक 66
स्वानुभूत्या स्वयं ज्ञात्वा स्वमात्मानमखण्डितम् ससिद्धः ससुखं तिष्ठन् निर्विकल्पात्पनात्मनि ॥
इस प्रकार अपनी अनुभूति से स्वयं ही अपनी आत्मा को अखण्डित जानकर (तु) सिद्ध हो और निर्विकल्प (विकल्प रहित) आत्मा से अपने को सुख पूर्ण स्थिति में प्रतिष्ठित कर।
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