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अध्यात्म • अध्याय 1 • श्लोक 59
अध्यस्तस्य कुतस्तत्त्वमसत्यस्य कुतो जनिः । अजातस्य कुतो नाशः प्रारब्धमसतः कुतः ॥
आरोपित अथवा भ्रान्त धारणा से जो कल्पित हो, वह सत्य कैसे हो सकता है? जो सत्य नहीं है, उसका जन्म कहाँ से हो और जिसका जन्म नहीं है, उसका विनाश कैसे हो? अस्तु जो असत् है, उसका प्रारब्ध कर्म कैसे बने?
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