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अध्यात्म • अध्याय 1 • श्लोक 55
व्याधबुद्धा विनिर्मुक्तो बाणः पातु गोमती न तिष्ठति नित्येव लक्ष्यं वेगेन निर्भरम् ॥
बाघ समझकर (उसे मारने के लिए) छोड़ा गया बाण यह जान लेने पर कि 'यह बाघ नहीं गाय है', रुकता नहीं और वेगपूर्वक लक्ष्य वेध करता हो है, उसी प्रकार ज्ञान हो जाने पर भी पूर्वकृत कर्म का फल मिलता ही है।
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