न नभो घटयोगेन सुरागन्धेन लिप्यते।
तथाऽऽत्मोपाधियोगेन तद्धर्मनैव लिप्यते ॥
जिस प्रकार सुरा कुम्भ में स्थित आकाश, सुरा की गन्ध से लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार शरीर रूपी उपाधि के साथ संयुक्त रहने पर भी आत्मा उसके गुण-धर्मों से प्रभावित नहीं होता।
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