स्वमसङ्गमुदासीनं परिज्ञाय नभो यथा न श्रूिष्यते यतिः किंचित्कदाचिद्भाविकर्मभिः ॥
योगी आकाश के सदृश अपने को असङ्ग और उदासीन जानकर भावी कर्मों में किञ्चित् भी लिप्त नहीं होता।
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