निर्विकल्पा च चिन्मात्रा वृत्तिः प्रज्ञेति कथ्यते सा सर्वदा भवेद्यस्य स जीवन्मुक्त इष्यते ॥
जब विकल्प रहित (ऊहापोह रहित) और मात्र चैतन्य रूप बन जाती है, तब उसे प्रज्ञा कहते हैं। वह (प्रज्ञा) जिसमें सर्वदा विद्यमान रहती है, वह 'जीवन्मुक्त' कहलाता है।
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