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अध्यात्म • अध्याय 1 • श्लोक 43
लीनवृत्तेरनुत्पत्तिर्मर्यादोपरतेस्तु मा स्थितप्रज्ञो यतिरयं यः सदानन्दमश्रुते ॥
लीन वृत्तियाँ पुनः उदित न हों, तो वह उपरति की स्थिति समझनी चाहिए। इस स्थिति वाला यति 'स्थितप्रज्ञ' कहलाता है, जो सदा आनन्दानुभूति करता रहता है।
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