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अध्यात्म • अध्याय 1 • श्लोक 40
अमुना वासनाजाले निःशेषं प्रविलापिते। समूलोन्मूलिते पुण्यपापाख्ये कर्मसंचये ॥
(जब) इस समाधि के द्वारा वासना का जाल पूर्णरूपेण लय को प्राप्त हो जाता है एवं जब पुण्य-पाप नामवाला कर्मसमूह समूल रूप से विनष्ट हो जाता है,
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