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अध्यात्म • अध्याय 1 • श्लोक 37
वृत्तयस्तु तदानीमप्यज्ञाता आत्मगोचराः । स्मरणादनुमीयन्ते व्युत्थितस्य समुत्थिताः ॥
समाधि की अवस्था में वृत्तियाँ केवल आत्मगोचर होती है, इसके कारण प्रतीत नहीं होती; किन्तु समाधि में से उठे हुए साधक की उन उन्नत वृत्तियों का स्मरण द्वारा अनुमान लगाया जाता है।
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