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अध्यात्म • अध्याय 1 • श्लोक 36
ध्यातृध्याने परित्यज्य क्रमाद्धयेयैकगोचरम्। निवातदीपवच्चित्तं समाधिरभिधीयते ॥
इसके पश्चात् ध्याता और ध्यान का परित्याग करके ध्येय में ही चित्त को स्थापित करें। वायुरहित स्थान में रखे दीपक की तरह जब चित्त निश्चल बन जाए, यही समाधि है।
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