श्रवण और मनन द्वारा सन्देह रहित हुए अर्थ में चित्त को स्थापित करके एकतानत्व प्राप्त करना यह 'निदिध्यासन' है। (धान का ऊँचा नीचा, पैना या भारी होना उसके दोलन (फ्रीकेंसी) पर निर्भर करता है। समान दोलन वाले साज जब साथ बजते हैं, तो उसके स्वर एक दूसरे में घुल-मिल जाते हैं। इसे ध्वनि दोलन का सुसंयोग (रेजोनेन्स ऑफ फ्रीकेंसी) कहते हैं। एकतानत्व का अर्थ यहाँ भावात्मक सुसंयोग (रैजोनेन्स) जैसा कुछ होना चाहिए)
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