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अध्यात्म • अध्याय 1 • श्लोक 23
असत्कल्पो विकल्पोऽयं विश्वमित्येकवस्तुनि । निर्विकारे निराकारे निर्विशेषे भिदा कुतः ॥
एक ही आत्मा रूपी वस्तु में जो यह विकल्प (भेह) प्रतीत होता है, वह प्रायः मिथ्या है; क्योंकि निर्विकार, निराकार और निर्विशेष में भेद ही कहाँ है?
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