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अध्यात्म • अध्याय 1 • श्लोक 22
स्वात्मन्यारोपिताशेषाभासवस्तुनिरासतः । स्वयमेव परंब्रह्म पूर्णमद्वयमक्रियम् ॥
अपनी आत्मा में समस्त वस्तुओं का आभास (रस्सी में सर्प की तरह) केवल आरोपित है, उसका निराकरण (निरसन) कर देने से वह स्वतः पूर्ण, अद्वैत और अक्रिय (क्रियारहित) परब्रह्म बन जाता है।
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