अन्तःशरीरे निहितो गुहायामज एको नित्यमस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरे संचरन् यं पृथिवी न वेद ।
यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरे संचरन् यमापो न विदुः ।
यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोऽन्तरे संचरन् यं तेजो न वेद ।
यस्य वायुः शरीरं यो वायुमन्तरे संचरन् यं वायुर्न वेद ।
यस्याकाशः शरीरं य आकाशमन्तरे संचरन् यमाकाशो न वेद ।
यस्य मनः शरीरं यो मनो ऽन्तरे संचरन् यं मनो न वेद ।
यस्य बुद्धिः शरीरं यो बुद्धिमन्तरे संघरन् यं बुद्धिर्न वेद ।
यस्याहंकारः शरीरं योऽहंकारमन्तरे संचरन् यमहंकारो न वेद ।
यस्य चित्तं शरीरं यश्चित्तमन्तरे संचरन् वं चित्तं न वेद यस्याव्यक्तं शरीरं योऽव्यक्तमन्तरे संचरन् यमव्यक्तं न वेद यस्याक्षरं शरीरं योऽक्षरमन्तरे संचरन् यमक्षरं न वेद यस्य मृत्युः शरीरं यो मृत्युमन्तरे संचरन् यं मृत्युनं वेद ।
स एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः ।
अहं ममेति यो भावो देहाक्षादावनात्मनि ।
अध्यासोऽयं निरस्तव्यो विदुषा ब्रह्मनिष्ठया ॥
शरीर के अन्दर स्थित हृदय रूपी गुहा में एक (अद्वितीय), अज (कभी जन्म न लेने वाला), नित्य (शाश्वत) निवास करता है। पृथिवी इसका शरीर है, यह पृथिवी के अन्दर रहता है; किन्तु पृथिवी इस (अज) को नहीं जानती। जल जिसका शरीर है, जो जल में निवास करता है, पर जल को उसका ज्ञान नहीं है। तेज जिसका शरीर है, जो तेज के अन्तर्गत संचरित होता है, पर तेज जिसे (जिसका संचरित होना) नहीं जानता। वायु जिसका शरीर है, जो बागु के अन्दर संचरित होता है, पर वायु जिसे नहीं जानता। आकाश जिसका शरीर है, जो आकाश में संचरित होता है, पर आकाश जिसे नहीं जानता। मन जिसका शरीर है, जो मन में संचरित होता है, पर मन जिसे नहीं जानता। बुद्धि जिसका शरीर है, जो बुद्धि में निवास करता है, पर बुद्धि जिसे जानती नहीं। जिसका शरीर अहंकार है, जो अहंकार में निवास करता है, पर अहंकार जिसे जानता नहीं। चित्त जिसका शरीर है, जो चित्त में संचरित होता है, पर चित्त जिसे जानता नहीं। अव्यक्त जिसका शरीर है, जो अव्यक्त में संचरित होता है, पर अव्यक्त जिसे जानता नहीं। अक्षर जिसका शरीर है, जो अक्षर में संचरित होता है, पर अक्षर जिसे जानता नहीं। जिसका शरीर मृत्यु है, जो मृत्यु में संचरित होता है, पर मृत्यु जिसे जानती नहीं-वही सर्वभूतों में स्थित उनका अन्तरात्मा है, वह निष्पाप है और वही एक दिव्य देवनारायण है। शरीर और इन्द्रियादि अनात्म विषय हैं। इनके विषय में 'मैं और मेरा का भाव' अध्यास (भ्रान्ति) मात्र है, इसलिए विद्वान् को चाहिए कि वह ब्रह्मनिष्ठ (ब्रह्मज्ञान) के द्वारा इस अध्यास (भ्रान्ति) को दूर करे।
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