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अध्यात्म • अध्याय 1 • श्लोक 14
सर्वत्र सर्वतः सर्वब्रह्ममात्रावलोकनम्। सद्भावभावनादार्व्याद्वासनालयमश्रुते ॥
जो सर्वत्र सब तरफ सभी को मात्र 'ब्रह्म' रूप में देखता है और जिसकी सद्भावना दृढ़ हो गई है, उसकी वासना का लय हो जाता है अर्थात् वासना विनष्ट हो जाती है।
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