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आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 7
तावत्सत्यं जगद्भाति शुक्तिकारजतं यथा। यावन्न ज्ञायते ब्रह्म सर्वाधिष्ठानमद्वयम्।।
जगत सत्य (सत्यम) तब तक प्रतीत होता है जब तक कि ब्रह्म, आधार, इस सारी सृष्टि का आधार, महसूस नहीं किया जाता है। यह मोती की सीप में चाँदी के भ्रम की तरह है।
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