जो दिशा, देश और काल आदि से निरपेक्ष होकर सर्वव्यापी, शीतादि द्वन्द्वों से रहित, नित्य सुखस्वरूप और निर्मल आत्मा में स्थित रहता है तथा निष्क्रिय होकर अपने ही आत्मरूप तीर्थ का आश्रय लेता है, वह सर्वज्ञ, सर्वव्यापी और अमृतस्वरूप हो जाता है।
इस प्रकार परमहंस परिव्राजकाचार्यश्रीगोविन्द भगवत्पूज्यपाद के शिष्य श्री शङ्करभगवान् द्वारा रचित आत्मबोध ग्रन्थ पूर्ण हुआ।
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