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आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 65
सर्वगं सच्चिदानन्दं ज्ञानचक्षुर्निरीक्षते। अज्ञानचक्षुर्नेक्षेत भास्वन्तं भानुमन्धवत्।।
सर्वव्यापी, सत्-चित्-आनन्द स्वरूप को केवल ज्ञान-चक्षु ही देख सकता है। अज्ञान-चक्षु उसे नहीं देख सकता, जैसे अन्धा व्यक्ति सूर्य को नहीं देख पाता।
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