जो कुछ भी देखा या सुना जाता है, वह ब्रह्म से भिन्न नहीं है। तत्त्वज्ञान से यह स्पष्ट होता है कि वही ब्रह्म है, जो सत्-चित्-आनन्द और अद्वय स्वरूप है।
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