मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 62
स्वयमन्तर्बहिर्व्याप्य भासयन्नखिलं जगत्। ब्रह्म प्रकाशते वह्निप्रतप्तायसपिण्डवत्।।
संपूर्ण ब्रह्मांड को बाहरी और आंतरिक रूप से व्याप्त करते हुए परम ब्रह्म स्वयं की तरह चमकता है जैसे आग एक लाल-गर्म लोहे की गेंद में व्याप्त होती है और स्वयं से चमकती है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
आत्मबोध के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

आत्मबोध के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें