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आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 62
स्वयमन्तर्बहिर्व्याप्य भासयन्नखिलं जगत्। ब्रह्म प्रकाशते वह्निप्रतप्तायसपिण्डवत्।।
ब्रह्म स्वयं भीतर और बाहर सर्वत्र व्याप्त होकर समस्त जगत को प्रकाशित करता है, जैसे अग्नि से तपाया हुआ लौहपिण्ड प्रकाशमान हो उठता है।
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