संसारः स्वप्नतुल्यो हि रागद्वेषादिसंकुलः।
स्वकाले सत्यवद्भाति प्रबोधे सत्यसद्भवेत्।।
यह संसार, जो राग, द्वेष आदि से भरा हुआ है, वास्तव में स्वप्न के समान है। अपने अनुभव के समय यह सत्य प्रतीत होता है, किन्तु ज्ञान-प्राप्ति होने पर इसका सत्यत्व समाप्त हो जाता है।
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