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आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 59
तद्युक्तमखिलं वस्तु व्यवहारश्चिदन्वितः। तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म क्षीरे सर्पिरिवाखिले।।
समस्त वस्तुएँ ब्रह्म से युक्त हैं और समस्त व्यवहार चैतन्य से अनुप्राणित है। इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म समस्त जगत में उसी प्रकार व्याप्त है जैसे दूध में घी व्याप्त रहता है।
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