मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 52
उपाधिस्थोऽपि तद्धर्मैरलिप्तो व्योमवन्मुनिः। सर्वविन्मूढवत्तिष्ठेदसक्तो वायुवच्चरेत्।।
यद्यपि मुनि उपाधियों में स्थित रहता है, फिर भी वह उनके धर्मों से अलिप्त रहता है, जैसे आकाश अलिप्त रहता है। वह सब कुछ जानता हुआ भी मूर्ख के समान रहता है और अनासक्त होकर वायु के समान विचरण करता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
आत्मबोध के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

आत्मबोध के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें