मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 51
बाह्यानित्यसुखासक्तिं हित्वात्मसुखनिर्वृतः। घटस्थदीपवच्छश्वदन्तरेव प्रकाशते।।
जो व्यक्ति बाह्य और अनित्य सुखों की आसक्ति का त्याग करके आत्मसुख में स्थित हो जाता है, वह भीतर ही भीतर निरन्तर उसी प्रकार प्रकाशित रहता है जैसे घड़े के भीतर रखा दीपक अपने ही भीतर प्रकाश फैलाता रहता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
आत्मबोध के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

आत्मबोध के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें