मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 5
अज्ञानकलुषं जीवं ज्ञानाभ्यासाद्विनिर्मलम्। कृत्वा ज्ञानं स्वयं नश्येज्जलं कतकरेणुवत्।।
ज्ञान का निरंतर अभ्यास अज्ञान से कलंकित आत्मा ('जीवात्मा') को शुद्ध करता है और फिर स्वयं गायब हो जाता है - जैसे 'काटक-अखरोट' का पाउडर मैले पानी को साफ करने के बाद नीचे बैठ जाता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
आत्मबोध के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

आत्मबोध के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें