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आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 48
आत्मैवेदं जगत्सर्वमात्मनोऽन्यन्न किंचन। मृदो यद्वद्धटादीनि स्वात्मानं सर्वमीक्षते।।
यह समस्त जगत केवल आत्मा ही है, आत्मा से भिन्न कुछ भी नहीं है। जैसे मिट्टी से बने घट आदि सभी रूपों में केवल मिट्टी ही देखी जाती है, वैसे ही ज्ञानी सर्वत्र आत्मा को ही देखता है।
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