सम्यग्विज्ञानवान्योगी स्वात्मन्येवाखिलं स्थितम्।
एकं च सर्वमात्मानमीक्षते ज्ञानचक्षुषा।।
पूर्ण बोध और आत्मज्ञान का योगी अपने "ज्ञान की आंख" (ज्ञान चक्षुष) के माध्यम से पूरे ब्रह्मांड को अपने स्वयं के रूप में देखता है और बाकी सब कुछ को अपनी आत्मा मानता है और कुछ नहीं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
आत्मबोध के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।