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आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 45
स्थाणौ पुरुषवद्भ्रान्त्या कृता ब्रह्मणि जीवता। जीवस्य तात्त्विके रूपे तस्मिन्दृष्टे निवर्तते।।
जैसे स्थाणु (खंभे) में पुरुष का भ्रम हो जाता है, वैसे ही ब्रह्म में जीवत्व का आरोप भ्रमवश होता है। जब जीव का वास्तविक स्वरूप समझ लिया जाता है, तब यह भ्रम समाप्त हो जाता है।
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