जैसे स्थाणु (खंभे) में पुरुष का भ्रम हो जाता है, वैसे ही ब्रह्म में जीवत्व का आरोप भ्रमवश होता है। जब जीव का वास्तविक स्वरूप समझ लिया जाता है, तब यह भ्रम समाप्त हो जाता है।
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