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आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 43
अरुणेनेव बोधेन पूर्वं संतमसे हृते। तत आविर्भवेदात्मा स्वयमेवांशुमानिव।।
ज्ञानरूपी प्रभात के उदय होने पर जैसे अन्धकार स्वयं नष्ट हो जाता है, वैसे ही अज्ञान के दूर हो जाने पर आत्मा स्वयं ही प्रकट हो जाता है, जैसे सूर्य स्वयं प्रकाशित हो उठता है।
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